आमवात ( Rheumatoid ) – कारण और आयुर्वेद औषध व्यवस्था

आयुर्वेद में बहुत सी वात व्याधियों का वर्णन है | इनमे से एक आमवात  है जिसे हम गठिया रोग भी कह सकते है | आमवात में पुरे शरीर की संधियों में तीव्र पीड़ा होती है साथ ही संधियों में सुजन भी रहती है | आमवात होने का प्रमुख कारण है हमारे शरीर मे दूषित वायु का बढ़ जाना हमारे  शरीर के सभी जोड़ो मे थोड़ा रिक्त स्थान होता है ओर हमारे शरीर मे उतपन्न दूषित वायु इन जोड़ो की रिक्त स्थान मे जमा हो जाती है ओर उसका परिणाम हम देखते है आमवात !   आमवात के रोगियो को सुबह सूर्योदय के पूर्व उठकर बासी मुह कम से कम 1 लीटर गुनगुना पानी बेठकर शिप शिप पीना चाहिए ! हमारी सुबह की लार के साथ गुनगुना पानी पीना आमवात के रोगियो के संजीवनी बूटी जेसा कार्य करता है क्यू की गुनगुना पानी पीने से छोटी आंत व बड़ी आंत से सफाई होते हुए अद्पच्चे अन्न से बने आम व मल पूरा साफ़ हो जाता है सुबह गुनगुना पानी पीने  का हमारे शरीर मे हुए बदलाव 7 दिन मे दिखने लगते है  

आमवात दो शब्दों से मिलकर बना है  – आम + वात |

आम अर्थात अद्पच्चा अन्न या एसिड और वात से तात्पर्य दूषित वायु | जब अद्पच्चे अन्न से बने आम के साथ दूषित वायु मिलती है तो ये संधियों में अपना आश्रय बना लेती है और आगे चल कर संधिशोथ व शुल्युक्त व्याधि का रूप ले लेती जिसे आयुर्वेद में आमवात और बोलचाल की भाषा में गठिया रोग कहते है | चरक संहिता में भी आमवात विकार की अवधारणा  का वर्णन मिलता है लेकिन आमवात रोग का विस्तृत वर्णन माधव निदान में मिलता है |

आमवात के कारण 

आयुर्वेद में विरुद्ध आहार को इसका मुख्य कारण माना है | मन्दाग्नि का मनुष्य जब स्वाद के विवश होकर स्निग्ध आहार का सेवन करता और तुरंत बाद व्यायाम कोई शारीरिक श्रम करता है तो उसे आमवात होने की सम्भावना हो जाती है | रुक्ष , शीतल विषम आहार – विहार, अपोष्ण संधियों में कोई चोट, अत्यधिक् व्यायाम, रात्रि जागरण , शोक , भय , चिंता , अधारणीय वेगो को धारण करने से आदि शारीरिक और मानसिक वातवरणजन्य कारणों के कारण आमवात होता है | 

आमवात के लिए कोई बाहरी कारण जिम्मेदार नहीं होता इसके लिए जिम्मेदार होता है हमारा खान-पान | विरुद्ध आहार के सेवन से शारीर में आम अर्थात यूरिक एसिड की अधिकता हो जाती है | साधारनतया हमारे शरीर में यूरिक एसिड बनता रहता है लेकिन वो मूत्र के साथ बाहर भी निकलता रहता है | जब अहितकर आहार और अनियमित दिन्चरिया के कारन यह शरीर से बाहर नहीं निकलता तो शरीर में इक्कठा होते रहता है और एक मात्रा से अधिक इक्कठा होने के बाद यह संधियों में पीड़ा देना शुरू कर देता है क्योकि यूरिक एसिड मुख्यतया संधियों में ही बनता है और इक्कठा होता है | इसलिए बढ़ा हुआ यूरिक एसिड ही आमवात का कारन बनता है |

वातहर योग ( हर्बल उकाला ) को 3 महिना सेवन करने से 100 % परिणाम प्राप्त हुए है आप चाहे तो मो – 84607 83401 पर कॉल करके मंगा सकते है इसकी कीमत 1  माह की 750 /- रुपए व 3 माह 1850 /- है   

आमवात के संप्राप्ति घटक 

दोष – वात और कफ प्रधान / आमदोष |

दूषित होने वाले अवयव – रस , रक्त, मांस, स्नायु और  अस्थियो में संधि |

अधिष्ठान – संधि प्रदेश / अस्थियो की संधि |

रोग के पूर्वप्रभाव – अग्निमंध्य, आलस्य , अंग्म्रद, हृदय भारीपन, शाखाओ में स्थिलता |

आचार्य माधवकर ने आमवात को चार भागो में विभक्त किया है 

1. वातप्रधान आमवात 

2. पितप्रधान आमवात 

3. कफप्रधान आमवात  

4. सन्निपताज आमवात 

आमवात में औषध प्रयोग 

आमवात में मुख्यतया संतुलित आहार -विहार का ध्यान रखे और यूरिक एसिड को बढ़ाने वाले भोजन का त्याग करे | अधिक से अधिक पानी पिए ताकि शरीर में बने हुए विजातीय तत्व मूत्र के साथ शरीर से बाहर निकलते रहे | संतुलित और सुपाच्य आहार के साथ विटामिन इ ,सी और भरपूर प्रोटीन युक्त भोजन को ग्रहण करे | अधिक वसा युक्त और तली हुई चीजो से परहेज रखे | 

इसके अलावा आप निम्न सारणी से देख सकते है आमवात की औषध व्यवस्था 

क्वाथ प्रयोग – रस्नासप्तक , रास्नापंचक , दशमूल क्वाथ, पुनर्नवा कषाय आदि |

स्वरस – निर्गुन्डी, पुनर्नवा , रास्ना आदि का स्वरस |

चूर्ण प्रयोग – अज्मोदादी चूर्ण, पंचकोल चूर्ण, शतपुष्पदी चूर्ण , चतुर्बिज चूर्ण |

वटी प्रयोग – संजीवनी वटी , रसोंनवटी, आम्वातादी वटी , चित्रकादी वटी , अग्नितुण्डी वटी आदि |

गुगुल्ल प्रयोग – सिंहनाद गुगुल्लू , योगराज गुगुल , कैशोर गुगुल , त्र्योंग्दशांग गुगुल्ल आदि |

भस्म प्रयोग – गोदंती भस्म, वंग भस्म आदि |

रस प्रयोग – महावातविध्वंसन रस, मल्लासिंदुर रस , समिर्पन्न्ग रस, वात्गुन्जकुश |

लौह – विदंगादी लौह, नवायस लौह , शिलाजीतत्वादी लौह, त्रिफलादी लौह |
अरिष्ट / आसव – पुनर्नवा आसव , अम्रितारिष्ट , दशमूलारिष्ट आदि |
तेल / घृत ( स्थानिक प्रयोग ) – एरंडस्नेह, सैन्धाव्स्नेह, प्रसारिणी तेल, सुष्ठी घृत आदि का स्थानिक प्रयोग 
स्वेदन – पत्रपिंड स्वेद, निर्गुन्द्यादी पत्र वाष्प |
सेक – निर्गुन्डी , हरिद्रा और एरंडपत्र से पोटली बना कर सेक करे | 

इसके अतिरिक्त हमे प्राचीन शास्त्रो से प्राप्त एक नुस्खा वातहर योग  द्वारा बहुत से मरीजो पर अपनाए जिसमे काफी अच्छा परिणाम प्राप्त हुआ है !  

वातहर योग( हर्बल उकाला ) को 3 महिना सेवन करने से 100 % परिणाम प्राप्त हुए है आप चाहे तो मो – 84607 83401 पर कॉल करके मंगा सकते है इसकी कीमत 1  माह की 750 /- रुपए व 3 माह 1850 /- है   

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked